आखिर कब होगा …इस विवाद का हल..

JANMAT VICHAR

……राम जन्मभूमि विवाद या फिर कहा जाए बाबारी मस्जिद विवाद एक ऐसा विवाद  जिसने न सिर्फ देश के राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी बल्कि देश को ये सोचने पर मजबूर भी कर दिया कि हिन्दू केवल हिन्दू है और मुस्लिम केवल मुस्लिम,  जहां एक ओर इस मुददे ने हमारे देश में भाईचारे की बुनियाद को हिलाकर रख दिया तो दूसरी ओर न जाने कितने बेगुनाह मासूम दंगो की आग में जल गये. यह देश का एक ऐसा विवाद है जो सबसे लम्बे समय तक चलता रहा है और आज भी यह विवाद देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन भी है। इस विवाद का हल करने के लिए बड़े बड़े प्रयास किये गये पर मामला जस का तस बना रहा ।

इस मुद्दे ने कुछ राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी का काम किया वहीं देश में दो धर्मो के लोगो के बीच एक ऐसी आग लगा दी, जो शायद ही अब कभी बुझ सकेगी। जहां एक ओर देश में धर्म की राजनीति इस मुद्दे को लेकर शुरु हुई यह मुद्दा तो कई दशको से चल रहा था लेकिन इस मुद्दे ने जोर पकड़ा वर्ष 1990 के बाद जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी जिसके बाद से मन्दिर मुद्दा प्रचंड हो गया और अयोध्या स्थित विवादित ढांचा गिरा दिया गया । उस समय भी जहां यह मामला अदालत में विचाराधीन था,  फिर भी  विवादित ढांचे का गिराया जाना .. आग में घी का काम कर गया। देश में दंगों की आग एक तरफ फैल गयी तो दूसरी तरफ सारे विश्व के सामने हमारे देश की कानून व्यवस्था का मखौल उड़ाया गया ।

कहीं न कहीं एक छोटे से विवाद को देखते ही देखते देश की राजनीती ने इतना बड़ा बना दिया और इसे धार्मिकता का रंग भी दे दिया गया । हालाँकि शुरू से ही यह मामला लोगो की भावनाओ से जुड़ा हुआ था.. चुकी मुस्लिम समाज बाबरी मस्जिद को तोड़ने के बाद से आक्रोश में थे… इससे देश दंगो की आग में जल गया. हालाँकि राम मन्दिर मुद्दे का हल जो भी हो लेकिन रामजन्मभूमि मुद्दे ने देश को एक ऐसे दोहराहे पर लाकर ज़रूर खड़ा कर दिया जहां से पता ही नहीं चला कि देश की राजनीति में धर्म का प्रवेश कब हो गया, इस मुद्दे के बाद देश की राजनीति का धर्माकरण हेा गया या फिर यूँ कहा जाये की धर्म का राजनीतिकरण हो गया …यह आज भी बहस का मुद्दा है। इस मुद्दे ने देश के भाईचारे और समरसता  के साथ साथ समाज के सेक्यूलर ढांचे को भी ध्वस्त कर दिया और दो समुदायों के बीच विभाजन की ऐसी लकीर खीच दी की जिसके पार खड़ा हर व्यक्ति दुसरे को शक और संदेह की निगाह से ज़रूर देखने लगा. हालाँकि हैरान कर देने वाली बात तो यह है की देश की राजनीति आज भी धर्म के चश्में से ही देखी जा रही है …एक तरफ यह ममला देश की सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है लेकिन राजनैतिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस मुद्दे को समय समय पर हवा ज़रूर देते रहतें हैं।

जहाँ एक ओर राममन्दिर के मुद्दे ने मात्र दो सांसदों वाली पार्टी को आज तीन सौ के करीब पंहुचा दिया अब वहीं यह दल इस मुद्दे से अपने दामन को दूर कर रहा है। देश के साथ ही विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कहे जाने वाली सत्ताधारी पार्टी  भाजपा आज इस मुद्दे को लेकर कहीं न कहीं दोराहे पर आ खड़ी है और कहीं न कहीं यह मुद्दा भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है. जिस मुद्दे ने कभी इसे संजीवनी प्रदान की थी आज वो इसी के लिए विष जैसा हो गया है.  इसके बाद भी आज यह मुद्दा अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है और प्रधानमंत्री जी को तो छोड़िये उनके सिप्पहे सालार भी आज इस मुद्दे पर बात तक करने को लेकर रजामंद नहीं है। एक समय देश का नारा था – एक ही नारा एक ही नाम- जय श्री राम , जय श्री राम….जो की भाजपा को सत्ता मिलने के बाद आज बदलकर हो गया सबका साथ- सबका विकास… चूकिं आज विकास की राजनीति कहीं न कहीं धर्म की राजनीति पर भारी पड़ गयी है. आने वाले समय में आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस बात का अंदाजा जरुर लगाया जायेगा कि सत्ता के आसन में बने रहने के लिए अब सत्ताधारी पार्टी किस मुद्दे को अहमियत देगी और भाजपा का सदाबहार मुद्दा राम मन्दिर, जो कि न्यायालय में विचाराधीन भी है.. उस पर आने वाले समय में पार्टी क्या प्रतिक्रिया देती है…यह तो आने वाल समय ही निर्धारित करेगा,,परन्तु बेहतर यही होगा यदि यह मुद्दा आपसी रजामंदी और देश की गंगाजमुनी तहजीब को बचाते हुए आपसी सहमति और सौहार्द से हल हो जाए … तो कहीं न कहीं दो धर्मा के साथ साथ यह दो विचारधारा को भी जोड़ देगा। चूंकिं पहले न कोई हिन्दू है और न कोई मुस्लमान है…. सास लेता है हर बन्दा… पहले हर कोई इंसान है…..।

 

अंकुश पाल

janmatankush@gmail.com  

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