आरक्षण – अवश्यकता, अधिकार अथवा अर्थहीन…

JANMAT VICHAR

तारीख..15 अगस्त सन् 1947 .. इस तारीख को आजाद भारत ने जन्म लिया जिसके साथ देश ने अधीनता की बेड़ियों को तोड़ा और आजादी के खुले आसमान के नीचे आजाद् हवा में सांस लेने को स्वतंत्र हुआ,हमें स्वराज्य का अधिकार प्राप्त हो चुका था। जिन अधिकारों के लिये कितनी महान्  विभूतियों, देशभक्तों  ने अपने प्राण मुस्कुराते हुये न्यौछावर कर दिये, उन शहीदो का सपना वास्तविकता का आकार ले चुका था। अब, हमें आगे की लड़ाई लड़नी थी, और इसी  के साथ  सभी नागरिकों को एक समान कानून के माध्यम से समानता और बराबरी के साथ ही  एक ऐसे  भारत का निर्माण करना था, जहां आजादी के साथ-साथ समानता का अभाव न हो, पक्षपात का कोई स्थान न हो और समाज की सबसे छोटी ईकाई तक को देश से जोड़ना था, पर सभी नागरिकों को बराबर का अधिकार प्रदान करना इतना आसान भी नहीं था.

संविधान निर्माण के समय बाबा भीमराव आंबेडकर जी ने समाज के वंचितों के  उत्थान के लिये आवाज उठाई एवं समाज में हीन-भावना से देखें जाने वाले इस वर्ग को समानता और समाज से जोड़ने के लिये आरक्षण की प्रबलता पर बल दिया, जो कि उक्त समयानुसार अत्यन्त आवश्यक  था। चूंकि एक ही नागरिको के लिए दो विधान नहीं हो सकते थे, जहां एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को छूने का अधिकार ही न हो वहां समानता जीवित नहीं रह सकती है। गंभीरता से देखा जाये तो क्या वर्तमान में वो समानता का सपना पूरा हो पाया, जो देश के निर्माणकर्ताओं ने आजादी के समय देखा था। उस समय आरक्षण का निर्माण निम्न वर्ग के उत्थान के लिये दिया गया, क्योंकि समाज में इस वर्ग कि स्थिति अत्यन्त खराब हो चुकी थी,   इन्के हालात जनवरों से भी बद्तर थे  किसी भी  कथित अन्य वर्ग के व्यक्ति को स्पर्श करने तक का अधिकार भी  नहीं था.

यहां तक कि अपने इष्ट देवता के मंदिर में भी दलित वर्ग के लोगो का जाना अवैध माना जाता था और ऐसा करने पर इनको बुरी तरह से मारा-पीटा जाता था यहां तक कि भगवान् का नाम लेने पर लोगो की जुबान तक काट दी जाती थी और अपनी जमीन पर खेती करने के लिये जमीन का अधिकार भी नहीं था, इस कारणवश  यह वर्ग दुसरे लोगो के यहां जुताई, बुआई का कार्य मजबूरीवश  करते थे, जिनके बदले इन्हें बड़ी कठिनाई से दो वक़्त का   भोजन मिल पाता था, परन्तु इस कारण आजीवन यह बंधुआ मजदूर के रुप में कार्य करने पर विवश  हो जाते थे। जैसा की सर्वविदित है की शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति का नैतिक,आर्थिक एवं सामाजिक विकास संभव है,  पर शिक्षा का भी अधिकार कुछ लोगो तक ही सीमित होने के कारण आरक्षित वर्ग की जनता का  उत्थान असंभव हो गया था इस हेतु ताउम्र की गुलामी एवं यातना सहने पर इन्हें विवश होना पड़ता था।  इन जातियों का विकास यदि आरक्षण से हो पाता है एवं समानता का  अधिकार मिल पाता है, तो इनके लिये आरक्षण परम्ावष्यक हो जाता है।

 

सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों को प्राप्त करने हेतु यदि समाज में निम्न वर्ग के लिये आरक्षण की मांग उठती है तो यह अनुचित भी नहीं है लेकिन वर्तमान में हर वर्ग को आरक्षण की मलाई खानी है, फिर चाहे वो वर्ग समाज में कितना ही सम्पन्न, प्रबल, उच्च कोटि की जीवन शैली में जीवन यापन क्यों न करता हो, जैसे  गुजरात में पटेल समाज के लिये आरक्षण का आन्दोलन, जबकि पटेल वर्ग अन्य वर्गो से मजबूत,संपन्न,धन,संपदा से भरपूर है, जिसमें कई हीरे के व्यापारी तक है, तो कई बड़े बड़े कारपोरेट घाराने के हैं, कई माननीय संासदगण भी इसी वर्ग के हैं.

 

आरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि मजबूत को और मजबूत एवं निर्बल को और निर्बल बनाए रखा जाये,  आरक्षण लगभग 70 वर्षो से दिया जा रहा है पर क्या दलित वर्ग के लोगो के रहन सहन में कोई परिवर्तन देखने को मिला…नहीं! बिल्कुल नहीं! वे आज भी काफी निम्न स्थिती में  है, इन वर्गो में भी कुछ सक्षम परिवारों को ही इसका लाभ मिलता आया है, और असली शोषित, कमजोर को इस वर्ग के अन्र्तगत आज भी इसका कोई फायदा नहीं हो सका है, जितने की अपेक्षा की गयी थी। जो वर्ग मैला ढोने जैसे अभिसाप के साथ जी रहा था, बंधुआ मजदूर के रुप में  जीवन यापन कर रहा था, आज भी ऐसे अभिशाप से यह वर्ग पूरी तरह से मुक्त भी नहीं हो पाया है। आज भी इन जातियों का उत्पीड़न हो रहा है। ठीक से देखा जाये तो एक समानता के अधिकार को ऐसे वर्ग तक पहुंचाने के लिए आरक्षण प्रदान किया गया। ताकि आर्थिक,नैतिक एवं सामाजिक लाभ दलित वर्ग को मिल सके।  आरक्षित वर्ग को जब तक समानता का अधिकार नहीं प्राप्त हो जाता है तब तक आरक्षण महत्वहीन ही है।

 

आज सन् 2018 में भी आरक्षण की श्रेणी में होने के बावजूद कई बेरोजगार युवाओं को रोजगार अभी तक प्राप्त नहीं हो पाया है, दो जून की रोटी तक दैनिक मजदूरी करने के बाद भी मिल पायेगी यह भी नहीं मालूम, गरीबी रेखा से नीचे ही जीवन यापन करने को विवश  है। यहां पर आखिर आरक्षण अर्थहीन एवं आधारहीन क्यों हो जाता है? यह सबसे बड़ा प्रश्न  है, यहां तक कि आरक्षित वर्ग के लोग अपने अधिकार एवं सरकार द्वारा दी जा रही योजनाओं के लाभ  से भी वंचित रह जाते है,क्योंकि ऐसी योजनओं की जानकारी एवं सूचना तक इन्हें प्राप्त नहीं हो पाती है। ऐसे देखा जाये तो, आरक्षण का एक सिरा  समर्थन करता है तो दूसरा विरोध। आखिर क्या जिस कारण से आरक्षण का जन्म हुआ वो पूर्ण हो सका या फिर मात्र राजनीतिक फायदे के लिये ही इसका प्रयोग होता आया है।

 

यह भी जरुरी है कि जरुरतमंदो एवं पात्र व्यक्तियों को ही  आरक्षण का लाभ प्रदान किया जाये। आधी से ज्यादा आरक्षित कल्याणकारी योजनाएं तो  मात्र कागजों के ढेर ही बनी रहती है। भ्रष्टाचार के कारण धरातल पर आ ही नहीं पाती। इस कारण पारदर्शिता से सभी योजनाओ का लागू करना भी आवश्यक  है क्योंकि समाज में दबे, कुचले, असमर्थ निम्न वर्गो को भी पूरी स्वतंत्रता सहित जीवन जीने का अधिकार है। यह वर्ग भी हमारे देश के ही नागरिक है।

 

आरक्षण सामाजिक रुप से दबे,कुचले, असमर्थ, हीन भावना से देखे जाने वाले निम्न वर्ग के आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास के लिये अत्यन्त आवश्यक  है, परन्तु वर्तमान समय में इसे प्रदान करने के मानक परिवर्तन योग्य जरुर हो गये है, उचित होगा यदि आरक्षण आर्थिक रुप से कमर्जार वर्ग, शोषित वर्ग एवं समाजिक रुप से अत्यन्त पिछड़े वर्ग को उनकी वास्तविक आर्थिक एवं सामाजिक और परिवारिक स्थिति के हिसाब से ही प्रदान किया जाये, चूंकि ऐसी नीति बनाने की इस समय  अत्यंत आवश्यकता  है। ध्यान रहे, जो नियम परिवर्तित नहीं होते वो बोझ बनकर रह जाते है, उनका होना न होना एक समान ही है। देश की सरकार को समय-समय पर इस हेतु रायसुमारी एवं सामाजिक सर्वे भी कराना चाहिये जिससे जरुरतमंदो, पात्रों, आर्थिक रुप से कमजोर एवं दयनीय स्थिति में जीवन यापन करने वाले पात्र परिवारों का कल्याण सम्भव हो सके।  साथ ही ऐसे अर्थहीन  आरक्षण का क्या महत्व जो प्रसाद के रुप में बिना सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का आकलन किये प्रदान किया जाये। इससे आरक्षण महत्वहीन, अर्थहीन एवं आधारहीन हो जायेगा।

 

अंकुश पाल

janmatankush@gmail.com    

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