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प्रकृति के कहर के आगे … ठहर गयीं हैं साँसे …

JANMAT VICHAR

…….अमृत के समान पानी कब विष बनकर सैकड़ों की जान ले ले यह मालूम ही नहीं होता है। एक जान की कीमत बहुत ज्यादा हेाती है, पर हमारे देश में जब तक कोई बड़ी घटना घटित नहीं होती और कई जाने खत्म नहीं होती तब तक प्रशासन नहीं जागता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर साल आने वाली बाढ के लिए हम तैयार क्यो नहीं  हो पातें है । एक तरफ तो पानी मरते को जीवन देता है और दूसरी तरफ यही  पानी लोगो की जान पल भर में छीन भी लेता है। अभी हाल ही में आयी बाढ़ ने यह सिद्ध कर दिया की प्रकृति जब देने पर आती है तो अपना सबकुछ न्यौछावर कर देती है और जब वापस लेने पर आती है तो इंसान की सांसे तक नहीं छोड़ती। अभी हाल ही में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड के साथ ही कई राज्यों मे भीषण बारिश के चलते बाढ़ जैसे हालत बन गए.. जिससे आम लोगो का जीवन अस्त वस्त हो गया वहीँ कई मासूमों को अपनी ज़िन्दगी से भी हाथ धोना पड़ा.

हर साल देश के कई राज्यों में भारी बारिश के बाद कई राज्यों में बाढ़  जैसे हालत हो जातें हैं , हमारे देश की यह एक ऐसी आपदा है जो प्राकृतिक तो है पर हमारे देश के जिम्मेदार लोग हर बार यही बात कहतें हैं कि हम बाढ़ की तबाही केा रोकने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और जब स्थिति खराब होती है तो कोई नज़र नहंी आता, हर साल सैकड़ों गांव बाढ़ की वजह से तबह हेा जातें हैं, शहर तो शहर गांवों के कच्चे और झोपड़ीनुमा मकानों का तो नामो निशांन बाढ़ के बाद मिट जाता है और यह सैलाब रुकता नहीं बल्कि अपने साथ कई जिन्दिगयां भी ले जाता है और छोड़ जाता है तो बस दूखों का पहाड़ जो उन मजबूरों के उपर टूटता है जो किसी भी तरह से इसके लिए तैयार नहीं रहतें।

सबसे जरुरी बात यह है कि एक मजदूर जो किसी तरह दो जून की रोटी की व्यवस्था करने में भी समर्थ नहीं होता और वहीं अपने कच्चे मकान को छप्पर और घास फूस से तेयार करता है वो ……. मकान केवल एक साल भी नहीं चल पाता चूकिं बाढ़ उसे अपने आगोश में ले लेती है और फिर उसे बांस – बल्ली खरीदकर दोबारा एक झोपड़ी बनानी पड़ती है जो कि आने वाली बाढ़ के बाद खत्म हो जायेगी उसे मालूम रहता है  … कि ऐसा होने वाला है… फिर भी वो इसका निर्माण करता है और उसके खत्म होने का इंतजार भी करता है। अगर बाढ़ से होने वाली तबाही के लिए किस्मत और प्राकृति को जिम्मेदार ठहराना है तो उतने ही जिम्मेदार  हमारे देश के नौकरशाह भी है जो इस हालात से निपटने के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर की तैयारी करने के बाद आश्वस्त नजर आतें हैं कि हालात काबू में हैं।

हालात तो इतने बूरे हो चुकें है कि एक छोटी सी बारिश के बाद की स्थिति को संभालना दूभर हो जाता है। जिन रास्तों पर फर्राटेदार वाहन दौड़तें हैं वहीं रास्ते पैदल चलने के लायक भी नहीं रह जातें। हां पानी में तैरने वालों की बात कुछ और ही है।  हालांकि सरकारें बाढ़ नियंत्रण के प्रति सजक नज़र आतीं है हर साल करोड़ों रुपयो ंका बजट बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रमों में खर्च भी किया जता है इसके बावजूद आखिर स्थिति में अमूल चूल बदलाव क्यों नहीं हो पातें यह भी एक बड़ा सवाल है।  हर साल हजारों लोगों की जान केवल बाढ़ के कारण चली जाती है। लोगों को अपना घर छोड़कर मन्दिरों की शरण लेनी पड़ती है और कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ता है और किन किन परेशानियों से दो चार होना पड़ता  हम कहां तक उसकी पीड़ा को समझ पातें हैं यह भी जरुरी है। इन हालातें के लिए केवल प्रकृति को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा लेकिन हमें उन जिंदगियों को ज़रूर बचाना होगा जो बिना किसी कसूर के मौत के मुह का निवाला बन जाते हैं.

 

अंकुश पाल 

janmatankush@gmail.com

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