Janmat Vichar

राजनीती के बोझ तले दबा युवाओं का भविष्य…

JANMAT VICHAR

…….हमारे देश के युवाओं पर कई प्रकार के ऐसे बोझ है जो कि आम तौर पर युवाओं के जीवन  पर भारी पड़ने लगे है। जिनके पास रोजगार है वो बेराजगारी जैसी बिमारी से अवगत ही नहीं होतें है। आपको बता दें कि बेरोजगारी एक ऐसी चिंगारी है जो एक बेरोजगार युवक के  अन्दर पल पल उठती रहती है और इसी की एक नजीर देखने को हाल ही में तब मिली जब  उत्तर प्रदेश में सफाई कर्मचारी की नौकरियां निकली, और आप विडंबना तो देखिए… बी. टेक, एम. टेक, पीएचडी होल्डर जैसे तमाम युवाओं ने बेरोजगार कहलाने से बेहतर सफाई कर्मचारी कहलाना पसंद किया .. लेकिन विडंबना तो यह रही कि इन शिक्षित युवाओं से शहर के गंदे गंदे नाले, बजबजाती नालीयां बिना किसी औजार या सुरक्षा उपकरण के  उनके हाथों से साफ करायी गयी। क्या उनके दिल में नहीं आया होगा कि क्या यही सपना था हमारा कि पढ़ने के बाद खुली नालियों को अपने हाथों से साफ करें लेकिन इसके बाद भी हमारी सरकारों को देखिए .. बेरोजगारी की बाट जोह रहें युवाओं से नाले साफ करवाएं, झाड़ू भी लगवाई लेकिन फिर भी उन्हें सफाई कर्मचारी भी बनना नसीब नहीं हुआ और यह भर्ती आज तक नहीं हो पायी है।

 

आपको बता दे युवाओं के बोझ के बारे में…पहले तो पढ़ाई का बोझ, पढ़ाई के बाद हासिल हुईं बड़ी बड़ी डिग्रीयों का बोझ… जो कि हाथी के सफेद दांत  से ज्यादा कुछ नहीं है …..इसके बाद नौकरी के लिए हाथों में फाइलों का बोझ और दर दर भट्कर रोजगार पाने के लिए विवश होने का बोझ ….बिना नौकरी के कंधों पर परिवार के जीवनयापन का बोझ… शायद इससे बड़ा कोई बोझ होगा जो आज देश का नौजवान अपने कंधों पर न जाने कितने बोझ उठाकर सरेराह घूम रहा होगा  लेकिन  इसके बावजूद हम बात करतें है तो बढ़ती हुई जीडीपी और  देश के विकास के बारें में ..अरे जनाब इसके पीछे भी एक और भारत है जिसे ढूँढने की ज़रुरत है… हालाँकि  भारत की छवि यहीं तक सीमित नहीं है ये जानना भी हमारे लिये जरुरी है कि हमारे देश के  नौजवान पढ़ाई करतें हैं और पढ़ाई के बाद डिग्री पर डिग्री हासिल करने के लिए बड़ी बड़ी प्रवेश परीक्षाओं मे भी बैठतें हैं। गौर करिएगा यह परीक्षाएं किसी नौकरी की नहीं होती ये तो इण्टर पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जरुरी अच्छे कालेज की दरकार के लिए होती है। इतने बोझ तले दबे हमारे बेरोजगार युवाओ  से हम उम्मीद लगाकर आखिर कैसे बैठ सकतें हैं, चूकिं हमारे देश का अधिकतर युवा काबिल होने के बावजूद बेरोजगार है।

आपको बता दे कि जहां एक ओर राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव को देखतें हुए पांच वर्ष बीत जाने के बाद अपनी ओर से रोजगार उपलब्ध न करा पाने के बाद सफाईयां पेश करती हैं और बतातीं है कि देश के सभी बेरोजगारों को हम रोजगार इतनी जल्दी नहीं प्रदान कर सकतें हैं। बेरोजगारी भत्ता दे सकतें है तो अगली सरकार भत्ता भी नहीं देती और रोजगार तो मानों उस चिड़िया का नाम है जो उम्र बीत जाने पर भी नहीं मिल पाती है।  तो मुद्दा यह है कि ये  आप आखिर चुनावों के समय ऐसे वादें क्यों करते ंहै जो मात्र छल के अलावा और कुछ नहीं होतंे है। अगर राजनीतिक पार्टियों को युवा नजर भी आता है तो वो भी चुनाव के समय और सभी समस्याओं के साथ ही बड़े बड़े वादें करके सत्ता का सुख भोगने वाली सरकारें नौकरियेां के नाम पर कहती हैं कि आप स्वयं अपना रोजगार क्येां नहीं चलातें हैं… जो बेरोजगार युवक अपनी टूटी हुयी चप्पल सिलवाने की क्षमता भी नहीं रखतें वो आखिर रोजगार कहां से पैदा करें।

इसी के साथ ही कई ऐसी योजनाएं भी संचालित करने का दावा सरकारें करतीं रहीं है जिसमें आपकों रोजगार करने हेतु लोन भी मिलता है और वो भी ऋणमुक्त और सब्सिडी युक्त लेकिन क्या ये नेतागण कभी बैंक गये है लेान के लिए.. ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई व्यक्ति लोन न मांगने गया हो बल्कि लूटने के लिए आप बैंक पहूंचे हो इस तरह से उनसे व्यवहार किया जाता है। क्या व्यवस्था है हमारे देश की एक से बढ़कर एक विषय की पढ़ाई मात्र रटने पर ही आधारित हो चुकी है। न किसी प्रकार की कोई रोचकता है और न ही कोई पढ़ाई आपको सीधे रोजगार दिलाने में सहायक हो सकती है। यह इतना ज्वलंत मुद्दा है जो आने वाले समय में और भी भीषण रुप ले सकता है लेकिन हमारे देश में जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती तब तक पूलों के सिरे ही नहीं कसे जातें है। अगर सरकार रोजगार देने में विफल है तो आखिर पढ़ाई लिखाई में ऐसे मूल चूल बदलाव क्येां नहीं करती जिससे बेरोजगारी जैसे दंश को दूर किया जा सके और कम से कम व्यक्ति जीवन यापन करने योग्य हो जाए।

ये समस्या भी उतनी बड़ी है जितनी बड़ी हमारे देश की आबादी है। इसे नजर अंदाज करना खुद को धोखा देने जैसा ही है। यदि रोजगार के अवसर नहीं प्रदान किये जा सकतें हैं तो कम से कम रोजगारपरक पाठ्यक्रम ही बना दिया जाये । चूंकि हमारी पढ़ाई रद्दी से शुरु होकर मात्र रद्दी पर ही खत्म हो रही है और देश के युवाओं का भविष्य मात्र रद्दी के ढेर जैसा हो गया है। जिसका वजन तो बहुत है पर इससे दो जून की रोटी का भी प्रबंध नहीं किया जा सकता है।

 

अंकुश पाल

janmatankush@gmail.com

 

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