“राफेल” का निकला जिन्न ….सत्ता न जाए छिन……

JANMAT VICHAR

 

जनमत विचार (जनमत) :-  देश में आगामी लोकसभा चुनाव को अब ज्यादा वक्त शेष नहीं है लेकिन वर्तमान समय की राजनीतिक स्थिति अभी तक जहां एक तरफा सी  नज़र आ रही थी वहीं अब समय के अनुसार इसमें भी धीरे धीरें बदलाव आ रहा है। चुनाव की धूरी जहां अभी तक भाजपा और मोदी हुआ करती थी वहीं अब यह बदलकर भाजपा बनाम अन्य हो चुकी है। यह बात अलग है कि अभी तक प्रधानमंत्री मोदी की टक्क्र में कोई अन्य बड़ा नेता भले ही बराबरी का नजर न आ रहा हो लेकिन कहीं न कहीं विपक्षीदलों के एक धड़े ने इस बात को भी मज़बूत किया है कि अब स्थिति 2014 जैसी बिल्कुल नहीं होने वाली।

यह बात अलग है कि अभी तक मौजूदा सरकार के दामन पर किसी प्रकार का भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था और सरकार की छवि बिल्कुल साफ थी लेकिन राफेल मुद्दे ने जहां भाजपा पर भ्रष्टाचार को लेकर सवालिया निशान लगा दिया है वहीं कहीं न कहीं मौजूदा मोदी सरकार की लोकप्रियता पर भी बट्टा जरुर लगा दिया है। एक तरफ जहां अभी तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बातों को लेकर जहां तक आम जनमानस उनसे जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा था, वहीं अब राफेल मुद्दे ने विपक्ष को एक संजीवनी जरुर दी है और वर्तमान केन्द्र सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोंपो के जबाब देना तो लाज़मी भी है।

वहीं दूसरी ओर भाजपा न तो इस मुद्दे का खुलकर  विरोध ही कर पा रही है और न ही विपक्ष के आरोपों को सिरें से खारिज कर पा रही है। इसी बीच रही सही कसर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के बयान ने भी रही सही कसर पूरी कर दी है। अब सरकार क्या करें, अगर वो इस पर सफाई देती है तो भी यह सवाल तो जरुर उठेगा की आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आई। आपको बता दे की वायु सेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कम से कम 42 लडा़कू स्क्वाड्रंस की जरूरत थी, लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता घटकर महज 34 स्क्वाड्रंस रह गई.

जिसके बाद वायुसेना की मांग आने के बाद 126 लड़ाकू विमान खरीदने का सबसे पहले प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने रखा था. लेकिन इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया कांग्रेस सरकार ने. रक्षा खरीद परिषद, जिसके मुखिया तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी थे, ने 126 एयरक्राफ्ट की खरीद को अगस्‍त 2007 में मंजूरी दी थी. यहां से ही बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई. इसके बाद आखिरकार 126 विमानों की खरीद का आरएफपी जारी किया गया. राफेल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये 3 हजार 800 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है. ऐसा नहीं है की  राफेल की डील भारत सरकार ने एकतरफा की हो जिसके लिए भारतीय वायुसेना ने कई विमानों के तकनीकी परीक्षण और मूल्यांकन किए और आपको जानकर हैरानी होगी की वर्ष 2007 में यह डील होनी थी पर चार साल बीत जानके के बाद  साल 2011 में यह घोषणा की कि राफेल और यूरोफाइटर टाइफून उसके मानदंड पर खरे उतरे हैं. जिसके करीब एक साल बाद साल 2012 में राफेल को एल-1 बिडर घोषित किया गया और इसके मैन्युफैक्चरर दसाल्ट ए‍विएशन के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर बातचीत शुरू हुई. लेकिन आरएफपी अनुपालन और लागत संबंधी कई मसलों की वजह से साल 2014 तक यह बातचीत अधूरी ही रही

चूँकियूपीए सरकार के दौरान इस पर समझौता नहीं हो पाया और यह बात सामने आयी की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध बन गया था. हालाँकि देश में आम चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और और भाजपा की सरकार बनी. साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसने इस दिशा में फिर से प्रयास शुरू किया. पीएम की फ्रांस यात्रा के दौरान साल 2015 में भारत और फ्रांस के बीच इस विमान की खरीद को लेकर समझौता किया. लेकिन इस बार विरोधि‍यों का कहना है कि यूपीए सरकार 18 बिल्कुल तैयार विमान खरीदने वाली थी और बाकी 108 विमानों का भारत में एसेंबलिंग की जानी थी. इसके अलावा इस सौदे में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की बात कही गई थी, ताकि खुद बाद में भारत में इन विमानों को बनाया जा सके. कांग्रेस का कहना है कि जब यूपीए सरकार सस्ते, बेहतर और व्यापक सौदे पर बात कर रही थी, तो इस सौदे को करने की एनडीए सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों थी…आपको बता दे की इस समझौते में भारत ने जल्द से जल्द 36 राफेल विमान फ्लाइ-अवे यानी उड़ान के लिए तैयार विमान हासिल करने की बात कही. समझौते के अनुसार दोनों देश विमानों की आपूर्ति की शर्तों के लिए एक अंतर-सरकारी समझौता करने को सहमत हुए. हालंकि यह मुद्दा अभी हाल ही में संसद के दौरान भी चर्चा के केंद्र में रहा जिसके बाद काफी हो हल्ला भी मचा था.

अब बात यह उठती है की मोदी सरकार का यह फैसला कहीं आने वाले चुनाव में उनपर ही भारी न पड़ जाए. चुकी जनता की अपकेक्षा और उम्मीद नयी सरकार से थी लेकिन पूर्व की सरकारों की तरह इस सरकार पर भी भ्रस्टाचार के आरोपों ने कहीं न कहीं बेदाग प्रधानमंत्री की शख्सियत पर एक सवाल खड़ा कर दिया है जिसका कोई मजबूत जवाब अभी तक देश की जनता को नहीं मिल पाया है. अब कौन सही है और कौन गलत है इसका जवाब तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. इस मामले में यह बात सटीक बैठती है की ….”बड़ा दागदार है यह ताज – ओ – तख़्त भी …. इसपर बैठकर सफेदपोश कोई बचा ही नहीं….. यह ऐसी काजल की कोठरी है … की बे – निशान भी … निशाने पर आ जाते हैं….और बेगुनाह के गुनाह भी धुल जाते हैं….

 

अंकुश पाल

janmatankush@gmail.com

 

 

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